गोंडी संस्कृति
अति प्राचीन गोंडी संस्कृति को जोहार सेवा 🙏🙏
इसे गोंडी बोली मे
धुर्रा पड़ेक यानी धुर्रा बीज बोलते हैं ,गोमची भी कहते हैं
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हिंदी में इसे गुंजा बीज कहते हैं
गोंडवाना के जंगलों में यह अल्प संख्या में पाये जाते हैं , अक्सर गोंडी गांव के आसपास होते हैं
- ये दो तरह के होते हैं ,लाल और सफेद
यह वेली यानी बेल प्रजाति का पौधा है
गोंड समाज और हमारे बैगा जन , इसके बीज और जड़ का उपयोग औषधि के रूप में कयी तरह से करना जानते थे, हैं , आर्य आगमन से पहले से ही कर रहे हैं
अक्सर ग्रामीण जन इसके बीज बच्चे के कमर मे बांधते हैं , नजर ना लगे , दांत अच्छे से निकल जाएं करके
और लू लगने पर जड़ को पीसकर पिलाते , मैंने देखा है ,कितनी मात्रा में यह याद नही है , इस भूमि की प्रथम विकसित सभ्यता गोन्डी सभ्यता को जोहार जोहार सेवा सेवा 💞🙏💞 #पवन_परते
जो गोंडवाना वनस्पति विलुप्त हो रही है , क्रपया उसे बचाने का प्रयास कीजिए , जून में गोंडवाना पेड़ों की व्रच्छारोपण कीजिए आदरणीय सगा जनों 🙏🙏

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